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Wednesday, March 11, 2026
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ईरान–इजरायल युद्ध में मौतें बढ़ीं, तेल की कीमतें भी चढ़ीं

ईरान–इजरायल युद्ध में बढ़ती मौतें, आम लोगों पर सबसे ज़्यादा असर

पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान–इजरायल युद्ध अब पूरे क्षेत्र के लिए मानवीय त्रासदी बनता जा रहा है। ईरान के अंदर कई दिनों से लगातार हवाई हमले और मिसाइल स्ट्राइक्स हो रही हैं, जिनमें सैकड़ों आम नागरिक मारे गए हैं। अल जज़ीरा और अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, सिर्फ ईरान में ही 1,000 से ज़्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कुछ आकलन इस संख्या को 1,200 के आसपास बताते हैं। ईरान रेड क्रेसेंट के मुताबिक मृतकों में बड़ी संख्या महिलाओं, बच्चों और स्कूली छात्राओं की है, जो स्कूलों और अस्पतालों पर हुए हमलों में मारी गईं।

हालात इतने गंभीर हैं कि ईरान की राजधानी तेहरान, पवित्र शहर क़ोम, इस्फहान और दक्षिणी प्रांतों में लगातार विस्फोटों और धुएँ के बादल देखे जा रहे हैं। कई जगहों पर बिजली, पानी और संचार व्यवस्था ठप है, लोग सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं। ईरान–इजरायल युद्ध के बीच न केवल सैन्य ठिकाने, बल्कि रिहायशी इमारतें, स्कूल और अस्पताल भी निशाने पर आ गए हैं, जिससे आम लोगों में डर, गुस्सा और असुरक्षा की भावना तेज़ हो गई है।

दूसरी तरफ इजरायल और लेबनान में भी ईरानी हमलों और रॉकेट फ़ायरिंग की वजह से नागरिकों की मौतें हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक इजरायल में कम से कम 10 नागरिक और कुछ सैनिक मारे गए हैं, जबकि लेबनान और खाड़ी देशों में भी हताहतों की संख्या बढ़ती जा रही है। कुल मिलाकर पूरे क्षेत्र में 1,300 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने की सूचना है, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

ईरान–इजरायल युद्ध और स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ – तेल बाज़ार के लिए बड़ा खतरा

ईरान–इजरायल युद्ध का दूसरा बड़ा असर वैश्विक तेल बाज़ार पर पड़ रहा है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता माना जाता है, जहाँ से दुनिया के कुल तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा रोज़ गुज़रता है। जैसे‑जैसे ईरान–इजरायल युद्ध तेज़ हुआ, वैसे‑वैसे इस संकरी जलसंधि से होकर जाने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही पर सवाल खड़े हो गए।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ से गुजरने वाले जहाज़ों की संख्या में 80% तक की गिरावट देखी गई है। कई बड़े तेल कंपनियों और शिपिंग ऑपरेटर्स ने अस्थायी रूप से इस रूट से अपने टैंकर हटाए हैं, क्योंकि बीमा प्रीमियम बहुत महँगा हो गया है और किसी भी तरह के हमले का जोखिम बना हुआ है।

इसी वजह से ईरान–इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद कुछ ही दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 70–73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 80–90 डॉलर के दायरे में पहुँच गईं। Citi और Goldman Sachs जैसे बड़े वित्तीय संस्थानों ने चेतावनी दी है कि अगर स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ लंबे समय तक बंद या आंशिक रूप से बाधित रहा, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी जा सकती हैं। कुछ विश्लेषकों ने तो सबसे खराब स्थिति में 120–150 डॉलर प्रति बैरल तक के अनुमान भी जताए हैं।

तेल की इन बढ़ती कीमतों का मतलब है कि ईरान–इजरायल युद्ध सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महँगाई, पेट्रोल‑डीज़ल के बढ़ते दाम और आर्थिक अस्थिरता के रूप में महसूस किया जाएगा। विकासशील देशों के लिए, जिनमें भारत भी शामिल है, ऊँची तेल कीमतें हमेशा बजट और व्यापार घाटे पर दबाव डालती हैं।

ईरान–इजरायल युद्ध में फँसे भारतीय, उड़ानें रद्द और भारत की निकासी मुहिम

ईरान–इजरायल युद्ध का सीधा असर भारत के हज़ारों नागरिकों पर भी पड़ा है, जो खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया के अलग‑अलग हिस्सों में काम या तीर्थ यात्रा के लिए गए हुए थे। कई देशों ने अपने एयरस्पेस पर प्रतिबंध लगा दिए, जिसके बाद खाड़ी क्षेत्र से आने‑जाने वाली हज़ारों उड़ानें रद्द या डायवर्ट हो गईं।​

रिपोर्टों के मुताबिक, सिर्फ कुछ ही दिनों में वैश्विक स्तर पर 12,000 से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं, जिनमें से बड़ी संख्या मिडिल ईस्ट रूट पर चलने वाली फ्लाइट्स की थी। भारत के कई प्रमुख एयरपोर्ट – दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता – पर खाड़ी से आने‑जाने वाली उड़ानें या तो देर से आईं या पूरी तरह कैंसिल हुईं।​​

ईरान–इजरायल युद्ध के कारण फँसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के लिए भारत सरकार ने एक विशेष निकासी अभियान शुरू किया है। सरकारी और निजी एयरलाइंस – जैसे Air India, IndiGo और कुछ अन्य – ने सऊदी अरब के जेद्दा, संयुक्त अरब अमीरात के फुजैरा और अन्य शहरों से विशेष राहत उड़ानें चलानी शुरू कर दी हैं। अब तक सैकड़ों भारतीय नागरिक इन विशेष फ्लाइट्स के जरिए सुरक्षित वापस लौट चुके हैं, और आने वाले दिनों में दर्जनों अतिरिक्त उड़ानें चलाने की योजना है।

विदेश मंत्रालय ने खाड़ी क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर और ऑनलाइन पोर्टल जारी किया है, ताकि जो लोग ईरान–इजरायल युद्ध के बीच किसी शहर या एयरपोर्ट पर फँसे हैं, वे अपना डेटा दर्ज कर सकें और निकासी उड़ानों की जानकारी पा सकें।

ईरान–इजरायल युद्ध का आगे का रास्ता और दुनिया की चिंता

ईरान–इजरायल युद्ध अभी किस दिशा में जाएगा, यह पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन कुछ बातें स्पष्ट हो चुकी हैं। पहली – इस संघर्ष ने यह दिखा दिया कि आधुनिक मिसाइल और ड्रोन युद्ध में आम नागरिक सबसे ज़्यादा निशाने पर आ जाते हैं, चाहे टारगेट सैन्य ठिकाने हों या नहीं। दूसरी – ईरान–इजरायल युद्ध सिर्फ दो देशों का झगड़ा नहीं, बल्कि पूरे मध्य‑पूर्व, तेल बाज़ार, अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला देने वाला संकट बन चुका है।

कई देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन तुरंत संघर्ष विराम और बातचीत की अपील कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर अभी तक गोलाबारी, हवाई हमले और जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी है। रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ईरान–इजरायल युद्ध लंबा खिंच गया और स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ पर तनाव बना रहा, तो आने वाले महीनों में तेल की कीमतें, शेयर बाज़ार और महँगाई – तीनों पर गहरा असर पड़ेगा।

दूसरी तरफ भारत जैसे देशों के लिए प्राथमिक चिंता यह है कि खाड़ी क्षेत्र में बसे लाखों भारतीय सुरक्षित रहें, उनकी नौकरियाँ और रोज़गार सुरक्षित रहें, और आवश्यक होने पर उन्हें समय रहते वापस लाने की व्यवस्था की जा सके।

कुल मिलाकर, ईरान–इजरायल युद्ध आज की तारीख में दुनिया की सबसे गंभीर विदेश नीति और सुरक्षा चुनौतियों में से एक बन चुका है। यह युद्ध सिर्फ नक्शे पर बने दो देशों की सीमा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा ज़िंदगी, उनकी जेब और उनके भविष्य को सीधे प्रभावित कर रहा है – और इसी वजह से पूरी दुनिया की नज़र अब लगातार पश्चिम एशिया पर टिकी हुई है।

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